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उत्तराखंड राज्य भीषण बिजली संकट के दौर से गुजर रहा है। राज्य में कमजोर मानसून और नदियों के घटते जलस्तर के कारण जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectric Projects) से होने वाले उत्पादन में भारी गिरावट आई है। उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) ने आधिकारिक रूप से ‘फोर्स मेज्योर’ (Force Majeure) का हवाला देते हुए प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में 35 मिनट से लेकर 15 घंटे तक की बिजली कटौती लागू कर दी है। औद्योगिक इकाइयों से लेकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में श्रेणीवार कटौती का रोस्टर जारी किया गया है।
विस्तृत विवरण
उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) के प्रबंध निदेशक के अनुसार, पिछले वर्ष सितंबर माह में पीक आवर्स के दौरान राज्य का जलविद्युत उत्पादन 1,094 मेगावॉट दर्ज किया गया था, जो इस वर्ष घटकर 912 मेगावॉट रह गया है। नदियों में जल प्रवाह कम होने से औसतन 170 मेगावॉट बिजली की सीधी कमी दर्ज की जा रही है।
वर्तमान में राज्य में बिजली की कुल मांग लगभग 53 मिलियन यूनिट है, जबकि उपलब्धता केवल 48 मिलियन यूनिट ही हो पा रही है। राज्य की कुल दैनिक आवश्यकता 2,700 मेगावॉट की है, जिसमें से लगभग 1,000 मेगावॉट की आपूर्ति राज्य की अपनी पनबिजली परियोजनाओं से होती है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय ग्रिड से मिलने वाले आवंटन में भी गिरावट दर्ज की गई है। 426 मेगावॉट के स्थान पर इस वर्ष केंद्रीय कोटे से केवल 338 मेगावॉट बिजली मिल पा रही है। टिहरी जलविद्युत परियोजना की दो इकाइयां तकनीकी खराबी के कारण बंद रहने से लगभग 100 मेगावॉट का अतिरिक्त नुकसान हुआ है।
दूरगामी प्रभाव और भविष्य का रोडमैप
कुमाऊं और गढ़वाल के भारी उद्योगों पर इस कटौती का सबसे गंभीर असर पड़ा है। UPCL के निदेशक (संचालन) के अनुसार, जलविद्युत पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए अब कोयला-आधारित तापीय ऊर्जा (Thermal Power) के दीर्घकालिक समझौतों पर काम चल रहा है। छत्तीसगढ़ के कोरबा स्थित एक थर्मल प्लांट के साथ वर्ष 2050 तक लगभग ₹5.2 प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद का दीर्घकालिक अनुबंध अंतिम चरण में है।
