नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court of India) ने राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक स्पष्ट फैसले में कहा है कि देश में किसी भी व्यक्ति को ‘वंदे मातरम’ गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और न ही ऐसा न करने पर किसी भी नागरिक को किसी प्रकार से दंडित किया जा सकता है।
संवैधानिक और कानूनी व्याख्या: यह महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार नागरिकों को देश के प्रति सम्मान व्यक्त करने के विभिन्न तरीके प्रदान करते हैं, लेकिन देशभक्ति की अभिव्यक्ति और जबरन थोपी गई वाणी (Compelled Speech) के बीच की रेखा को पार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी दोहराया कि भारत का संविधान अपने नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, और किसी व्यक्ति की गरिमा के खिलाफ जाकर राष्ट्रगीत या अन्य प्रतीकों के गायन को अनिवार्य कानून के रूप में थोपना न्यायिक और संवैधानिक कसौटी पर सही नहीं ठहरता। कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की दिशा में एक मील का पत्थर बताया है।
