जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण टिहरी में फॉरेस्ट की जमीन पर मानचित्र स्वीकृति का बड़ा खेल
प्रशांत राजपूत , एपिक उत्तराखंड
जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण टिहरी में अधिकारी पूरी तरह से बे लगाम हो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं। जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण टिहरी में नियमों को ताक पर रखकर मानचित्र स्वीकृत कराने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। नियमों की अनदेखी पर आपत्ति करने वाले सहायक अभियंता का उत्पीड़न करके उन्हें ही नोटिस जारी किया गया है।
मामला अमित गुप्ता की पत्रावली TSN/CCC/0011/26-27 से जुड़ा है।
इसको लेकर सहायक अभियंता द्वारा आपत्ति उठाने पर 15 सितंबर को उत्तराखंड आवास एवं शहरी विकास प्राधिकरण कार्यालय में हुई मीटिंग में नक्शा हर हाल में पास करने को कहा गया और अगले ही दिन 16 सितंबर को आपत्ति उठाने वाले सहायक अभियंता को ही कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया है।

जिस के जबाब में सहायक अभियंता ने अपने स्प्ष्टीकरण में बताया आपके द्वारा मुझे मानचित्र पत्रावली सं- TSNICCI0011/26-27. अमित गुप्ता की स्वीकति के संबंध में UHUDA कार्यालय में 15 / 09 /2026 को 11am वार्ता हेतु बुलाया गया था। उक्त वार्ता में प्रस्तावित मानचित्र के वास्तुविद भी कार्यालय में सम्मलित थे। वार्ता अंतर्गत प्रस्तावित मानचित्र पर चर्चा हुई एवं मेरे द्वारा स्पष्ट रूप में यह अवगत कराया गया की जो भवन खसरा सं० 605 में दर्शाया गया है वह मानचित्र पत्रावली पर उपलब्ध सजरा प्लान एवं गूगल मैप की इमेज को मिलान करने पर स्पष्ट रूप से खसरा सं० 513 में दष्टिगोचर होता है। आपके समक्ष ये भी स्पष्ट किया गया है माननीय उच्चतम न्यायालय के Civil Appeal No.4452 of 2019 में पारित आदेश के अनसार खसरा सं० 513एक private forest है जिस पर’ वन संरक्षण अधिनियम के प्राविधान लागू होते हैं। उक्त तथ्य से अवगत कराने के पश्चात आपके द्वारा नाराजगी व्यक्त करी गयी एवं उक्त मानचित्र को किसी भी दशा में स्वीकृत करने हेतु निर्देशित किया गया । मुझे ऐसा अनुभव होता है कि प्रतिक्रिया स्वरूप दिनांक 16 / 09/ 2026 को मेरा स्पष्टीकरण कर दिया गया। सहायक अभियंता ने यह दावा भी किया है की UHUDA में लगे सीसीटीवी कैमरे की 15/09/2026 की रिकॉर्डिंग से से साक्ष्य प्राप्त किये जा सकते है

अब सवाल उठ रहा है कि क्या प्राइवेट फॉरेस्ट की जमीन पर मानचित्र स्वीकृति का जबरन दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही क्या आपत्ति उठाने वालों को ही नोटिस देकर दबाया जा रहा है? जब प्राधिकरण अपने ही कर्मचारियों को नोटिस बांटने में लगा है तो अवैध निर्माण पर कार्रवाई कौन करेगा?

