वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन में खुलासा, बड़े ग्लेशियरों की बर्फीली सतह की रफ्तार भी घटी; भविष्य में जल उपलब्धता पर पड़ सकता है असर
देहरादून। हिमालय के बर्फीले पहाड़ों पर जलवायु परिवर्तन का असर अब आंकड़ों में भी साफ दिखाई देने लगा है। लद्दाख के डोडा नदी बेसिन में किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि छोटे ग्लेशियर बड़े ग्लेशियरों की तुलना में कहीं तेजी से सिकुड़ रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2005 से 2023 के बीच पांच वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में करीब 12.9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों के क्षेत्रफल के साथ-साथ उनकी सतही गति और बर्फ के भंडार में हो रहे बदलावों का भी आकलन किया है।
18 साल में तीन वर्ग किलोमीटर घटा ग्लेशियरों का क्षेत्रफल
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में डोडा नदी बेसिन के 25 ग्लेशियरों को शामिल किया गया। आंकड़ों के अनुसार, इन ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल वर्ष 2005 में लगभग 346 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर करीब 343 वर्ग किलोमीटर रह गया। यानी इस अवधि में लगभग तीन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कम हो गया।
कुल क्षेत्रफल में करीब 0.9 प्रतिशत की गिरावट भले ही पहली नजर में कम दिखाई दे, लेकिन ग्लेशियरों के आकार के आधार पर आंकड़े अधिक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। अध्ययन में छोटे ग्लेशियरों पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव दर्ज किया गया है।
छोटे ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित
अध्ययन में ग्लेशियरों के आकार के आधार पर उनकी स्थिति का विश्लेषण किया गया। इसके आंकड़े बताते हैं कि छोटे ग्लेशियरों के अस्तित्व पर दबाव अधिक बढ़ रहा है।
- 5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियर: क्षेत्रफल में करीब 12.9% की कमी।
- 5 से 10 वर्ग किलोमीटर वाले ग्लेशियर: क्षेत्रफल में लगभग 3.8% की गिरावट।
- 10 वर्ग किलोमीटर से बड़े ग्लेशियर: क्षेत्रफल में करीब 1.2% की कमी।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि ग्लेशियरों के सिकुड़ने का असर सभी पर एक जैसा नहीं है। छोटे ग्लेशियरों में दर्ज गिरावट विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। हालांकि, अलग-अलग ग्लेशियरों की स्थिति स्थानीय तापमान, बर्फबारी, ऊंचाई और अन्य भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर अलग हो सकती है।
सिर्फ आकार नहीं, बर्फ की गति भी हुई धीमी
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों की सतह पर बर्फ की गति में आए बदलावों का भी विश्लेषण किया। इसके लिए वर्ष 1999-2000 और 2022-2023 की अवधियों की तुलना की गई।
निष्कर्षों के अनुसार, बड़े ग्लेशियरों की औसत सतही गति में लगभग 44.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि मध्यम आकार के ग्लेशियरों की गति करीब 33 प्रतिशत कम हुई।
ग्लेशियरों की सतही गति में बदलाव महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि इससे उनके भीतर बर्फ के प्रवाह और गतिशीलता की स्थिति समझने में मदद मिलती है। हालांकि, गति में कमी का सटीक कारण जानने के लिए तापमान, बर्फबारी, ग्लेशियर की मोटाई और अन्य स्थानीय परिस्थितियों को भी साथ में देखना जरूरी है।
भविष्य की जल उपलब्धता के लिए क्यों अहम हैं ये आंकड़े?
हिमालयी ग्लेशियर पहाड़ी नदियों के जल चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बर्फ के जमाव और पिघलने की प्रक्रिया नदियों के प्रवाह को प्रभावित करती है। ऐसे में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, मोटाई और गति में लंबे समय तक होने वाले बदलाव भविष्य में जल उपलब्धता और नदी प्रवाह के मौसमी स्वरूप पर असर डाल सकते हैं।
हालांकि, किसी नदी में पानी की उपलब्धता केवल ग्लेशियरों पर निर्भर नहीं करती। बारिश, मौसमी बर्फबारी, तापमान और भूजल जैसे कारक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए ग्लेशियरों में दर्ज बदलावों को व्यापक जलवायु और जल संसाधन अध्ययन के साथ समझना जरूरी है।
वैज्ञानिक अध्ययन ने बढ़ाई निगरानी की जरूरत
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, अग्रभाग के पीछे हटने, सतही गति, ऊंचाई में बदलाव और बर्फ के संतुलन का आकलन किया गया है। यह शोध सात अक्टूबर को स्प्रिंगर की पत्रिका Regional Environmental Change में प्रकाशित हुआ।
अध्ययन के निष्कर्ष पश्चिमी हिमालय में ग्लेशियरों की बदलती स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। छोटे ग्लेशियरों में अधिक क्षेत्रफल की कमी और बड़े ग्लेशियरों की सतही गति में गिरावट इस बात की जरूरत रेखांकित करती है कि हिमालयी क्षेत्रों में दीर्घकालिक निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन को और मजबूत किया जाए।
