उत्‍तराखंड की नीति घाटी का लोकपर्व है Independence Day, छुट्टी लेकर पहुंचते हैं लोग; एक साथ फहराते हैं तिरंगा

भारत-चीन सीमा पर स्थित नीति घाटी में स्वतंत्रता दिवस को एक लोक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-दुनिया से प्रवासी भारतीय अपने गांव लौटते हैं। घाटी के छह गांवों के लोग पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं और स्थानीय संस्कृति का प्रदर्शन करते हुए दुंफूधार तक झांकी व प्रभातफेरी निकालते हैं। यह परंपरा 1947 से चली आ रही है।

  1. नीति घाटी में स्वतंत्रता दिवस का लोक उत्सव
  2. प्रवासी भारतीय मनाने पहुंचे गांव
  3. 1947 से चली आ रही है परंपरा

 गोपेश्वर। भारत-चीन सीमा पर स्थित गमसाली गांव में आजादी के उत्सव को मनाने के लिए देश-दुनिया में रह रहे प्रवासी छुट्टी लेकर नीति घाटी के गांवों में पहुंच गए हैं। लगभग 11 हजार की आबादी वाली जनजातीय बहुल नीति घाटी में स्वतंत्रता दिवस का जश्न लोक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

नीती घाटी की छह ग्राम सभाओं के लोग पारंपरिक व्यंजन बनाकर लोकरंग की अनूठी छटा बिखेरते हुए अपने गांव से दुंफूधार तक विकास व नए आयामों की झांकी व प्रभातफेरी निकालते हैं। इस परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 1947 से यह सिलसिला शुरू हुआ।

प्रवासी छुट्टी लेकर नीति घाटी पहुंचे

पर्व उत्सव विकास समिति के अध्यक्ष विजय रावत का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में हर गांव से ग्रामीण गाजे-बाजों के साथ प्रभातफेरी के रूप में गमसाली गांव के दुंफूधार में एकत्रित होकर तिरंगा फहराते हैं। फिर शुरू होता है सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर और देशभक्ति के गीतों से गूंज उठती है पूरी घाटी। यह ऐसा मौका है, जब पलायन के चलते गांवों में वीरान पड़े घर भी आबाद हो जाते हैं।

बांपा गांव के 69 वर्षीय बैंक के अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए कुशाल सिंह पाल बताया कि वे आजादी का पर्व मनाने देहरादून से गांव लौट आए हैं। गमसाली निवासी सेवानिवृत्त आइएफएस अधिकारी विनोद फोनिया का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस सीमा क्षेत्र के लिए न केवल लोक उत्सव बन चुका है, बल्कि यह नीती घाटी की छह ग्रामसभाओं की एकता का भी प्रतीक है।

एमडीडीए के चीफ इंजीनियिर पद से सेवानिवृत्त 63 वर्षीय नत्था सिंह रावत बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में लाल किले पर तिरंगा फहराए जाने की जानकारी सीमांत गांवों के लोगों को एक दिन बाद मिली थी। उस दिन लोगों ने अपने घरों में दीप जलाए और फिर पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर गमसाली के दुंफूधार में एकत्र होकर स्वतंत्रता की खुशियां मनाईं।

मेहरगांव के सेवानिवृत्त आइएफएस 62 वर्षीय लक्ष्मण सिंह रावत कहते हैं कि स्वतंत्रता दिवस को देश की आजादी के समय से ही यहां पर लोकपर्व के रुप में मनाया जाता है। इस मौके पर घाटी की नीती, गमसाली, बाम्पा, फरख्या, मेहरगांव व कैलाशपुर ग्रामसभाओं के लोग पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर दुंफूधार पहुंचते हैं। वहां ध्वजारोहण के बाद सब मिल-जुलकर भोज करते हैं। इन दिनों भी घाटी के गांव प्रवासियों से गुलजार होने लगे हैं।

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