उत्तराखंड में कृषि भूमि का संकट, पांच साल में 63 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन बंजर

उत्तराखंड में पिछले पांच सालों में 63,291 हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो गई है, जिसका मुख्य कारण गांवों से पलायन और वन्यजीवों से फसलों को नुकसान है। पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पर्वतीय जिलों में यह समस्या अधिक गंभीर है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है।

देहरादून। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले उत्तराखंड में खेती पहले ही तमाम झंझावत से जूझ रही है। उस पर गांवों से हो रहे पलायन ने चिंता और बढ़ा दी है। बीते पांच वर्षों के दौरान की तस्वीर इसे बयां करने को काफी है।

पलायन निवारण आयोग की ओर से वन्यजीवों से फसल क्षति को लेकर सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में राज्य में 63,291.42 हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो गई। यह आंकड़ा न केवल खेती के सिकुड़ते दायरे को दर्शा रहा है, बल्कि पलायन की समस्या से इसके गहरे संबंध को भी उजागर करता है।

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार कृषि भूमि के बंजर होने का दायरा पर्वतीय जिलों में अधिक है। पौड़ी जिले में इस दृष्टि से गंभीर स्थिति है, जबकि इसके बाद अल्मोड़ा और टिहरी जिले हैं। इन तीनों जिलों में ही कुल बंजर भूमि का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा है।

यही नहीं, चमोली, उत्तरकाशी, चंपावत, बागेश्वर, पिथौरागढ़ जिलों में भी कृषि भूमि का उपयोग घट रहा है। अलबत्ता, ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार जिलों में स्थिति बेहतर है। इन मैदानी जिलों में सिंचाई, संसाधन और बाजार की उपलब्धता के चलते खेती अच्छी स्थिति में है।

पर्वतीय जिलों में लोगों के कृषि से विमुख होने के पीछे के कारणों को भी रिपोर्ट में इंगित किया गया है। इनमें वन्यजीवों से फसल क्षति, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, बिखरी व छोटी जोत, उत्पादों की बाजार तक पहुंच का अभाव, श्रमशक्ति में कमी, युवाओं के शिक्षा व रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन जैसे कारण मुख्य हैं। इन परिस्थितियों में बंजर हो रही भूमि का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

आयोग ने रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि खेती-किसानी को पुनर्जीवित करने के लिए पहाड़ में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार जरूरी है। इसके साथ ही फसल सुरक्षा को प्रभावी उपाय, कृषि में आधुनिक तकनीकी का उपयोग और किसानों को बाजार से जोड़ने की दिशा में गंभीरता से कार्य करने की जरूरत बताई गई है।

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